धनबाद, अगस्त 5 -- दिशोम गुरु शिबू सोरेन नहीं रहे, लेकिन उनके किस्से झारखंड के गांवों और विशेषकर आदिवासी समाज के बीच लोगों की जुबान पर हमेशा बने रहेंगे। लंबी बीमारी के बाद 81 वर्ष की उम्र में दिल्ली में अंतिम सांस लेने वाले शिबू सोरेन की कर्मभूमि झारखंड के गांव और खेत खलिहानों में रही है। आदिवासियों को सशक्त करने के लिए उन्होंने नशे की लत जैसी कई तरह की कुरीतियों को दूर करने के लिए संघर्ष किया तो शिक्षा की तरफ मोड़ने की भी भरसक कोशिश की। 1970 के दशक में आदिवासियों को अधिकार दिलाने की लड़ाई शुरू करने वाले शिबू सोरेन ने धनबाद के टुंडी में रात्रि पाठशाला शुरू कराई थी। इसमें बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक पढ़ाई करने पहुंचते थे। टुंडी के आंदोलन में शिबू सोरेन के सहयोगी रहे लाला सुराल बताते हैं कि जिस गांव में दिशोम गुरु शिबू सोरेन रात्रि पाठशाला खोलत...
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