नई दिल्ली, दिसम्बर 6 -- उस स्नेहिल पिता का नाम रामचंद्र था। वह उम्र से हारने लगे थे और उन्हें लगने लगा था कि वह अपने इकलौते पुत्र का प्रेम पाने के मोर्चे पर हारकर ही संसार से विदा होंगे। पूरे नौ वर्ष बाद उन्होंने पुत्र को बहुत आग्रहपूर्वक अपने पास बुलाया था। वह पिता अपनी भाव-भंगिमा से ही भयभीत लग रहे थे। वाकई, बूढ़े पिता का एक सबसे बड़ा भय यही होता है कि कहीं पुत्र दूर न हो जाए। पिता समझ गए थे कि पुत्र उन्हें रत्ती भर भी समझ नहीं पाया है। सचमुच, पुत्र को पिता की कोई परवाह नहीं थी। पिता-पुत्र के बीच मतभेदों का महासागर था, जो पुत्र की मनमानी से उत्पन्न हुआ था। ऐसे में, एक दिन पिता ने पुत्र को बहुत प्रेम से अपने पास बिठाया और पूछा, 'क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे नाम का अर्थ क्या है? तुम्हारा नाम मैंने क्या सोचकर रखा था?' पुत्र ने सहज ही अन...