संभल, मार्च 17 -- बहजोई। कुम्हार समाज मिट्टी में रंग भरता है, लेकिन उसकी जिंदगी बेरंग हो गई है। मिट्टी पर महंगाई की मार, अधिक मेहनत और खरीदार गिनती के। दिवाली और अन्य त्योहारों को छोड़कर लोगों का मिट्टी के बर्तनों से मोह भंग हो रहा है। कुम्हार कहते हैं कि विद्युत चाक से क्या होगा। शहर में न तो मिट्टी का कोई साधन नहीं है और न ही बर्तनों की पकाई की कोई व्यवस्था है। गांवों से मिट्टी खरीदकर लानी पड़ती है। पैतृक काम तो जरूर कर रहे हैं, लेकिन सुविधाओं के आभाव में काम तेजी नहीं पकड़ पा रहा है। कुम्हारों का कहना है कि सरकार की ओर से चाक मिलना अच्छी बात है पर बर्तन बनाने के लिए सांचा, पकाने के साथ मिट्टी छानने की मशीन की कमी रहती है। मिट्टी की स्थिति यह है कि एक छोटा डनलप 1000 से 1200 रुपये तक का आता है। मिट्टी पर महंगाई की मार तेजी से पड़ रही है और म...
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