बगहा, अक्टूबर 11 -- बेतिया। 'तुझ सा लहरों में बह लेता तो मैं भी सत्ता गह लेता, ईमान बेचता चलता तो मैं भी महलों में रह लेता। चंपारण के गोपाल सिंह नेपाली ने कविता के इन पंक्तियों से सत्ता में भ्रष्टाचार पर जबरदस्त चोट की थी। हिन्दी के प्रोफेसर डॉ. कल्याण कुमार झा कहते हैं कि गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली की कविताएं और गीत वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी प्रासंगिक हैं। मौजूदा राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में उनकी कविताएं सटीक बैठती है। नेपाली की तरह चनपटिया के विंध्याचल प्रसाद गुप्त, रामनगर के दीपक एंथोनी, सरयू सिंह सुंदर समेत दर्जनों कवियों, साहित्यकारों और उपन्यासकारों ने समय-समय पर नेताओं को शुचिता का पाठ पढ़ाते रहे हैं। इसी तरह विंध्याचल प्रसाद गुप्त के उपन्यास नील के धब्बे 19वीं सदी में नील की खेती के लिए किसानों पर अंग्रेजों के अत्याचार पर ...
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