वाराणसी, फरवरी 23 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। निर्वाण का अर्थ मृत्यु नहीं, ज्ञान की पूर्णता में विलीन होना है। मठ में गुरु के निर्वाण उत्सव (महाप्रयाण दिवस) पर धर्म सभा, भौतिक देह के विसर्जन और उनकी दिव्य चेतना (विदेह स्वरूप) के साथ एकाकार होने का महोत्सव है। ये बातें राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक डॉ.गणेशदत्त शास्त्री ने कहीं। वह दशाश्वमेध स्थित चार सौ वर्षों से ज्यादा प्राचीन कामरूप मठ में सोमवार को आयोजित धर्मसभा में विचार व्यक्त कर रहे थे। यहां पूर्व महंतद्वय स्वामी अच्युतानंद तीर्थ एवं स्वामी बाणेश्वरानंद तीर्थ के निर्वाण महोत्सव पर आयोजन किया गया था। श्रीकाशी विद्वत परिषद् के मंत्री डॉ.गणेश दत्त शास्त्री ने कहा कि यह दिन गुरु की शिक्षाओं को पुनः स्मरण करने, कृतज्ञता व्यक्त करने और आत्म-साधना में दृढ़ता लाने का अवसर होता है।...