बांका, जनवरी 9 -- बांका, वरीय संवाददाता। कभी बांका जिले ही नहीं आसपास की जीवनरेखा मानी जाने वाली चांदन, ओढनी, चीर, सुखनियां, बदुआ आदि छोटी-बड़ी नदियां आज सिमटकर नालों में तब्दील हो रही हैं। जनवरी माह में इन नदियों की हालात गंभीर बनते जा रही है। इन नदियों के सूखने और उनके अविरल प्रवाह के टूटने का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था भी बुरी तरह प्रभावित हुई है। खासकर वे समुदाय, जिनकी आजीविका सीधे नदियों पर निर्भर थी, आज रोजगार और रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे अधिक मार मछुआरा समाज पर पड़ी है। पहले नदियों से सालभर मछली मिल जाती थी, जिससे परिवार का गुजारा चलता था। अब नदी में पानी नहीं रहने से मछलियां या तो खत्म हो गई हैं या बेहद कम रह गई हैं। इलाके के मछुआरे रामेश्वर निषाद बताते हैं, "पहल...
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