छपरा, जनवरी 6 -- छपरा, नगर प्रतिनिधि।सारण की धरती सदियों से नदियों की गोद में पली-बढ़ी है। गंडक, घाघरा और उनकी सहायक नदियां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि खेती, मछली पालन, जैव विविधता और जनस्वास्थ्य की जीवनरेखा रही हैं लेकिन बीते कुछ वर्षों में इन नदियों का स्वरूप तेजी से बदला है। कभी अविरल बहाव और कलकल धारा के लिए पहचानी जाने वाली नदियां आज कई स्थानों पर सिकुड़ चुकी हैं। कहीं धारा टूट गई है, तो कहीं रेत के टीले उभर आए हैं। जय गोविंद उच्च विद्यालय दिघवारा के भूगोल के प्राध्यापक डॉ विनय प्रताप सिंह ने कहा कि कभी नदियों की कल-कल ध्वनि से जागने वाला सारण आज उसी खामोशी से डरने लगा है।सारण की नदियां आज एक मौन चेतावनी दे रही है। उनका सूखना केवल पानी का संकट नहीं, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और आजीविका पर मंडराता खतरा है। जलीय जीवों से लेकर इंसान तक, हर...