रामकिंकर उपाध्याय, दिसम्बर 9 -- अभिमान की भावना से मुक्त हुए बिना गुरु की सेवा करना प्रदर्शन मात्र है, भक्ति नहीं। ऐसी सेवा का परिणाम कल्याणकारी नहीं हो सकता। 'मानस' में ऐसी गुरुभक्ति का दृष्टांत लंकाधिपति रावण के रूप में हमारे सामने आता है। रावण भगवान शंकर का शिष्य है। उसने भगवान शंकर की स्तुति में ताण्डव स्तोत्र की रचना की है। इसमें जो कामनाएं प्रकट की गई हैं, वे बड़ी उदात्त हैं। रावण के विषय में यह वर्णन भी आता है कि भगवान शंकर की पूजा में उसने अपने सिर काटकर चढ़ा दिए थे। इसे पढ़-सुनकर कोई भी व्यक्ति आश्चर्यचकित हो जाए, यह स्वाभाविक है, क्योंकि साधारणतया बिल्ब पत्र, दूर्वा एवं पुष्प आदि अर्पित कर भगवान शंकर की पूजा की जाती है। 'मानस' में रावण स्वयं इस घटना का बार-बार स्मरण दिलाता है। इसके पीछे रावण की गुरुभक्ति न होकर केवल यह दिखाने की...