नई दिल्ली, नवम्बर 8 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार हिंदी के एक आचार्य ने कहा कि तुलसी पर बात करने को तरस गया। आचार्य जीवित होते, तो पूछता कि सर जी! इतने दिनों तक हिंदी के सर्वेसर्वा रहकर भी तुलसी पर बात करने को कैसे तरस गए? क्या किसी ने सेंसर लगाया? आप तो जब चाहते, तुलसी पर बात कर सकते थे। आप बनारस के, तुलसी बनारस के, पचास साल तक हिंदी की सल्तनत आपके पास रही। ऐसे में, यह आत्म-स्वीकार कैसा, जिसमें आत्म-परिताप नहीं? यह तो अपने आपको माफीनामा देने जैसा है? भला आपको किसका डर था? तुलसी के राम से डर था या 'एंटी राम लॉबी' के साथ थे आप? तुलसी का यही जादू है, जो ऐसे बहुतों को डराता है। तुलसी 440 बोल्ट के खुले तार हैं। छुआ, तो गए; न छुआ, तो उससे बचते-बचते रहे। तुलसी का यही काव्यात्मक तिलिस्म है कि तुलसी के हुए तो फिर और किसी काम के न रहे। तुलसी की...