वाराणसी, जनवरी 13 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। डॉ.राजेंद्र उपाध्याय का जाना मेरे लिए केवल एक गुरु या वरिष्ठ रंगकर्मी का जाना नहीं है। यह मेरे बचपन, मेरी स्मृतियों और काशी के उस रंगमंच का जाना है जो जोखिम से डरता नहीं था। जो असहमति से घबराता नहीं था। जिसे लोकप्रिय होने की जल्दी नहीं थी। यह कहना है नगर के वरिष्ठ रंगधर्मी विपुल कृष्ण नागर का। इन दिनों जीयो स्टार में सीनियर वाइस प्रेसिडेंट के पद पर सेवा दे रहे विपुल कहते हैं मैं नाटक और मंडली की बातें सुनते-सुनते बड़ा हुआ। हमारे घर में रंगमंच कोई गतिविधि नहीं, जीवन की तरह उपस्थित था। पिताजी (पं.रमेशकृष्ण नागर) और उनके साथियों की बातचीत, बहसों, ठहाकों और असहमतियों में एक नाम बार-बार उभरता था, वह डॉ.राजेंद्र उपाध्याय का था। हर बार यह नाम आते ही मुझे लगता था कि कोई ऐसा व्यक्ति है जो तयशुदा रास्त...
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