नई दिल्ली, नवम्बर 9 -- सुहेल वहीद,वरिष्ठ पत्रकार बादशाहों की सल्तनत समाप्त हुई, नवाबों के ठाठ गए, तो उनके शाही दस्तरख्वान के जायके आम आदमी को मयस्सर हुए। शाही दस्तरख्वान तैयार करने वाले खानसामा दुकान लगाकर बाजार में बैठ गए। दिल्ली के करीम मुगल दरबार के बावर्ची थे, तो लखनऊ के टुंडे के जनक नवाब भोपाल के बावर्ची मंगल के पुत्र हाजी मोहम्मद अली लखनऊ आए और पुराने लखनऊ के अकबरी गेट के पास कबाब पराठे का रेस्तरां खोला। नवाब वाजिद अली शाह के वंशज नवाब मीर जाफर अब्दुल्लाह कबाब को लखनऊ की तहजीब का हिस्सा मानते थे। लखनऊ की मिट्टी की नमी यहां के खानों में भी होती है। नवाबों के जमाने में बावर्ची टीम के मुखिया हकीम होते थे, हांडी सबसे पहले वही चखते थे, इसीलिए उनकी निगरानी में तैयार होने वाले पकवान नुकसान नहीं करते थे। हर नवाब और शहंशाह के यहां की अपनी खा...