नई दिल्ली, नवम्बर 15 -- सुधीश पचौरी, हिंदी साहित्यकार श्रद्धा हुई वृद्धा, फिर भी हम हिंदी वाले हर समय श्रद्धा से ओत-प्रोत रहते हैं और अवसर-अनवसर श्रद्धांजलियां देते-लेते रहते हैं। जिसे श्रद्धा शब्द पुराना और हिंदू टाइप लगता है, वह उसे शोक-सभा का नाम दे देता है या स्मृति-सभा नाम रखकर शोक को भी 'सेकुलर टच' दे देता है, लेकिन होता सब वही-वही है, जैसा कि होता है। जैसे, वाट्सएप पर लेखक के नाम सहित एक फोटो और आने का निवेदन और विनम्र निवेदकों की जगह परिवारी-जनों के नाम, सभा-स्थल के एक कोने में मेज पर परम श्रद्धेय लेखक की फ्रेम में मढ़ी बड़ी सी तस्वीर, तस्वीर के आगे गुलाब की पंखुरियों से भरी एक थाली और कुछ धूपबत्ती आदि जलती हुई। अपना मीडिया ऐसी खबरों के लिए हमेशा तत्पर रहता है : इधर लेखक एम्स, सफदरजंग आदि में भरती हुआ नहीं कि उधर एडवांस में लेखक क...
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