नई दिल्ली, जनवरी 22 -- यह जीवन वसंत ऋतु है और तुम सोए-सोए बिताए दे रहे हो! वसंत आ गया, फूल खिल गए हैं, पक्षी गीत गा रहे हैं, मोर नाच रहे हैं, सारा जगत उल्लास से भरा है और तुम सोए-सोए बिता दोगे? तुम मूर्च्छित ही बने रहोगे? तुम कैसे पागल हो! जागने की घड़ी आ गई, वसंत द्वार थपथपा रहा है। सब तरफ राग-रंग है। सब तरफ प्रभु की वर्षा है। सूरज निकल आया, किरणों का जाल फैल गया। तुम कैसे पागल हो कि अभी भी सोए हो! फिर कब जागोगे तुम? क्या सोवै तू बावरी, चाला जात वसंत।/ चाला जात वसंत, कंत ना घर में आए। प्यारे को तूने खोजा ही नहीं। प्यारे को घर भी नहीं बुलाया। प्यारे को पाती भी न लिखी, निमंत्रण भी नहीं भेजा और वसंत के जाने के क्षण करीब आने लगे। यह जीवन अभी है, अभी खो जाएगा। यह सदा नहीं रहेगा। जीवन आता है, चला जाता है। यह क्षणभंगुर है। इसे प्रभु की पुकार बना...