भभुआ, अक्टूबर 7 -- (नुक्कड़ पर चुनाव) अखिलेश श्रीवास्तव रामगढ़। शहर का सूर्य मंदिर परिसर का सरोवर। राजनीतिक व सामाजिक गतिविधियों का गवाह रहा है। यहां रोजाना सुबह-शाम बैठकी लगती है। समसामयिक मुद्दों पर चर्चा होती है। वर्तमान में चुनावी चर्चा पर जोर है। लाठी के सहारे हांफते हुए बटोही बाबा आए। वह भी बैठ गए। थोड़ी देर दम लेने के बाद शुरू हो गए। कई ऐसे हैं, जो सियासी नाव पर चढ़े। लेकिन, पतवार सिंहासन तक पहुंचाया ही नहीं। जनमत की धारा ऐसी थिर प्रतीत हुई। सियासी नाव भंवर में फंस गई। अब तक राजयोग नहीं। बटोही बाबा के सियासी राग छेड़ते ही मुराहू की कैची जुबान शुरू हो गई। उनकी बातों को कुतरना शुरू कर दिए। कहा, देखो भाई, बुरा मत मानना। सियासत तो दोधारी औजार है। एक तरफ उंचाई छांटती है तो दूसरी तरफ से खाई पाटती है। आगे का तमाशा देखना है। कितने जन बीते चुनाव...
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