नई दिल्ली, नवम्बर 25 -- एक साधक परम पुरुष के प्रति कब पूर्णत: समर्पित हो पाता है? बहुत ही गूढ़ प्रश्न है। इसका उत्तर न जाने कब से तलाशा जा रहा है। मेरी राय में यह अवस्था व्यक्ति के पूर्णतया निर्भीक होने पर ही आती है। जब व्यक्ति सत्य, श्रद्धा और अनुशासन से भर जाता है, तब भय उसके निकट नहीं आता, क्योंकि सत्य अपने आप में निडर है, उसके लिए कोई शत्रु नहीं, कोई विपत्ति नहीं। समय-समय पर असत्य के प्रबल दिखने के उदाहरण अवश्य मिलते हैं, लेकिन उसकी गति अस्थायी होती है। वह आता है और चला जाता है; अस्तित्व उसका क्षणभंगुर है। सत्य इसके विपरीत है। सत्य अतीत में भी था, वर्तमान में भी है और भविष्य में भी रहेगा। इसलिए संघर्ष चाहे जितना तीखा हो, अंतिम विजय सत्य की ही होती है। हमारी परंपरा ने स्थायी जीत को विजय कहा है और क्षणिक सफलता को जय। असत्य को केवल जय मि...
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