जमुई, दिसम्बर 18 -- जमुई, असद खान/निज संवाददाता एक समय था जब गांवों की सुबह चिड़ियों की चहचहाहट, पगडंडियों पर किसानों के कदमों की धीमी थाप और खेतों में गूंजते लोकगीतों से महकती थी। खेती सिर्फ मेहनत का काम नहीं, बल्कि पूरे गांव के सामूहिक उत्साह, मेल-मिलाप और परंपराओं का जीवंत उत्सव हुआ करता था। धान की कटनी से लेकर गेहूं की बुआई तक हर कृषि गतिविधि गांव की संस्कृति में रची-बसी थी। सिर पर गमछा, कंधे पर हंसुआ और झोले में चूड़ा-गुड़, सत्तू-द६ी, यही किसानों की दिनभर की सच्ची ऊर्जा होती थी। खेतों की ओर जाते हुए वे अइसन दिनवा ना आवे, जैसे गीत गुनगुनाते और यही गीत काम को और जीवन को रसपूर्ण बना देते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि तब श्रमदान की अद्भुत परंपरा थी। किसी के खेत में कटनी होनी हो तो बिना कहे पूरा गांव उसकी मदद के लिए पहुंच जाता था। मजदूरी या सौदेब...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.