मुजफ्फरपुर, अक्टूबर 12 -- मुजफ्फरपुर, अजय कुमार पांडेय। बिहार विधानसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। अभी सभी दलों ने अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा भले ही नहीं की है, लेकिन संभावित दावेदारों की सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावों की धूम है। लेकिन, एक समय ऐसा भी था, जब निर्दलीय से लेकर दलों के कार्यकर्ता केवल जनसंपर्क कर ही चुनाव प्रचार करते थे। इस स्थिति में 1970 के दशक के छात्र आंदोलन के बाद बड़ा बदलाव आया। दीवार लेखन के तौर पर प्रचार की नई विधा विकसित हुई। अब प्रत्याशियों का संदेश नील और गेर के पाउडर के साथ ही सरकंडे व खजूर की कूची के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने लगी। जेपी सेनानी और राजनीति में पिछले छह दशक गुजार चुके हरेन्द्र कुमार कहते हैं कि आपातकाल समाप्त होने के बाद सन 1977 में विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ हो रहे थे। जार्ज फर्नांड...
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