मुजफ्फरपुर, जनवरी 9 -- मुजफ्फरपुर। जिस ईंट से इमारतें खड़ी होती हैं, शहरी विकास की बुनियाद पड़ती है, उसे बनाने वाले हाथों पर इतने भी पैसे नहीं कि चिमनी के धुएं के पार बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का ख्वाब देख सकें। बाहर से आकर जिले के ईंट भट्ठों पर मजदूरी कर रहे श्रमिकों को तो सरकारी राशन का भी सहारा नहीं। इनका कहना है कि तीन से सात सौ रुपए की दिहाड़ी में खाना और कल के लिए बचाना मुमकिन ही नहीं। ज्यादा से ज्यादा सरकारी योजनाओं का लाभ दिलवाया जाए, ताकि जीवनयापन सुगम हो। वहीं, ईंट उत्पादन से जुड़े व्यवसायियों की भी अपनी व्यथा है। कड़े नियम, अनुचित कर और लागत से भी कम ईंट की सरकारी दर इनकी परेशानी का सबब है। मजदूर और कारोबारी दोनों सरकार से मदद की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जिले के ईंट संचालक और इसमें दिहाड़ी कमाने वाले मजदूर मुश्किल दौर से गुजर रहे ह...
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