चित्तौड़गढ़, दिसम्बर 18 -- राजस्थान के इतिहास में चित्तौड़गढ़ केवल एक किला नहीं, बल्कि वह भूमि है जहाँ गौरव ने अंतिम सांस तक समझौता नहीं किया। यह वही स्थान है जहाँ युद्ध केवल तलवारों से नहीं लड़े गए, बल्कि आत्मसम्मान के लिए अग्नि तक को स्वीकार किया गया। चित्तौड़गढ़ की जौहर गाथाएँ आज भी यह बताती हैं कि मेवाड़ के लिए पराजय से अधिक भयावह था- 'अपमान'। चित्तौड़गढ़ ने इतिहास में तीन बड़े हमले झेले और हर बार जौहर हुआ। ये घटनाएँ राजस्थान की चेतना में त्याग और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में दर्ज हैं। "राजस्थान गाथा" सीरीज के पहले अंक में पढ़िए 'चित्तौड़गढ़ के हमले और जौहर की कहानी'।1303: अलाउद्दीन खिलजी का आक्रमण और पहला जौहर साल 1303 में दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की। महीनों की घेराबंदी के बाद जब यह स्पष्ट हो...
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