नई दिल्ली, फरवरी 17 -- आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति शास्त्र में जीवन की सफलता और सुख के लिए बहुत ही व्यावहारिक सिद्धांत दिए हैं। एक प्रसिद्ध श्लोक में वे कहते हैं -धनधान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहणेषु च।आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्॥ अर्थात - धन के प्रयोग में, विद्या ग्रहण में, भोजन में और व्यवहार में शर्म त्याग देने वाला व्यक्ति सुखी होता है। चाणक्य के अनुसार,जहां शर्म और संकोच करना उचित है, वहां करना चाहिए, लेकिन कुछ जगहों पर शर्म करने से जीवन में हानि होती है और व्यक्ति पीछे रह जाता है। आइए जानते हैं इनके बारे में विस्तार से..धन-दौलत के मामले में शर्म ना करें चाणक्य कहते हैं कि धन के प्रयोग और लेन-देन में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए। अगर किसी ने आपसे पैसे उधार लिए हैं, तो उन्हें वापस मांगने में संकोच ना करें। उधार देने में भी स्पष्टत...
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