नई दिल्ली, फरवरी 19 -- चाणक्य नीति में अर्थ और धन के संचय को लेकर बहुत स्पष्ट और कठोर नियम बताए गए हैं। एक प्रसिद्ध श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं:अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दश वर्षाणि तिष्ठति।प्राप्ते एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति।। अर्थात् - अन्याय से कमाया गया धन अधिकतम दस वर्ष तक टिकता है। ग्यारहवें वर्ष में वह जड़ से नष्ट हो जाता है। यह श्लोक सिर्फ एक चेतावनी नहीं, बल्कि जीवन का एक कठोर सत्य है। चाणक्य जी ने स्पष्ट रूप से बताया है कि जो धन छल, कपट, धोखा, रिश्वत, चोरी, अन्याय या अनैतिक तरीके से कमाया जाता है, वह कभी स्थायी नहीं रहता है। आइए इस श्लोक के गहरे अर्थ और उसके जीवन में प्रभाव को समझते हैं।अन्याय से कमाया धन का स्वभाव चाणक्य के अनुसार, अन्याय से कमाया धन कभी स्थिर नहीं रहता। इसमें रिश्वत, चोरी, धोखाधड़ी, गलत व्यापार, दूसरों का...