संभल, दिसम्बर 16 -- मुदस्सिर हुसैन असमोली। जहां रोजगार की तलाश में लोग शहरों का रुख करते हैं, वहीं असमोली थाना क्षेत्र का एक छोटा-सा गांव शाहबाजपुर कला पिछले 65 वर्षों से खुद रोजगार गढ़ रहा है। यहां चांदी सिर्फ आभूषण नहीं बनती, बल्कि पीढ़ियों की मेहनत, हुनर और आत्मनिर्भरता की कहानी गढ़ती है। गांव की गलियों में कदम रखते ही हर घर से आती ठक-ठक की आवाज़ मानो यह कहती है "हुनर हो तो गांव भी करोड़ों का कारोबार बन सकता है।" शाहबाजपुर कला सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि यह संदेश है कि अगर हुनर पीढ़ी दर पीढ़ी सहेजा जाए, तो गांव भी आत्मनिर्भर बन सकता है। यह गांव बताता है कि रोजगार के लिए पलायन जरूरी नहीं, अगर हाथों में हुनर और दिल में हौसला हो तो सब आसान हो सकता है। दिल्ली से आया हुनर, गांव की पहचान बना कारोबार ग्रामीणों ने बताया कि करीब 65 साल पहले मौली ...