बागपत, जनवरी 9 -- बड़ौत। अजितनाथ सभागार मंडी में आचार्य विमर्श सागर ने प्रवचन करते हुए कहा कि गृहस्थ जीवन में दान की पराकाष्ठा होती है और मुनि जीवन में त्याग की। दान की पराकाष्ठा होती है, तो इतना पुण्याश्रव होता है कि गृहस्थ तीर्थंकर प्रकृति का बंध करके किमिच्छक दान देने के योग्य हो जाता है। तीर्थंकर प्रकृति की विशेषता है कि इस प्रकृति की उत्कृष्ट स्थिति बंध गृहस्थ ही करता है, मुनि नहीं। क्योंकि गृहस्थ समस्त क्रिया को कृत्यात्मक कर सकता है। सभा का संचालन श्रेयांस जैन ने किया। सभा में महेंद्र जैन, मुकेश जैन, प्रदीप जैन, वरदान जैन, अनिल जैन, विकास जैन, इंद्राणी जैन आदि रहे।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित...
Click here to read full article from source
इस लेख के रीप्रिंट को खरीदने या इस प्रकाशन का पूरा फ़ीड प्राप्त करने के लिए, कृपया
हमे संपर्क करें.