वाराणसी, जुलाई 7 -- वाराणसी, कार्यालय संवाददाता। मोहर्रम की दसवीं तारीख यानि यौम-ए-आशूरा का दिन। या हुसैन की सदाएं बुलंद हो रही थीं। युवकों का हुजूम सीनाजनी और खंजर-कमा से मातम कर रहा था। अकीदतमंद छोटी-बड़ी ताजियों के साथ सुबह से दरगाहे फातमान और सरैयां स्थित इमामबाड़े में पहुंचने लगे। नदेसर, ककरमत्ता, बजरडीहा, हुकुलगंज, छित्तुपुरघौसाबाद, लोहता, रामनगर सहित अन्य इलाके से लोग जुलूस लेकर निकले थे। रास्ते में युवा फन-ए-सिपहगिरी (करतब) करते चल रहे थे। शाम को नई सड़क, कालीमहाल, लल्लापुरा और दरगाहे फातमान के बीच पैर रखने की जगह नहीं थी। अलग-अलग इलाकों के ताजिया जुलूस फातमान पहुंच रहे थे। लल्लापुरा में सबसे पीछे रांगे की ताजिया निकली। उसके आगे सैकड़ों ताजिया चल रही थीं। जुलूस जिस रास्ते से गुजरता वहां घरों की छतों से ख्वातीन भी उसकी हमसाया हो जा...