वाराणसी, जनवरी 20 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। भारत के चिर युवा स्वामी विवेकानंद ने कहा था 'कला कोई भी हो उसकी मूल प्रवृत्ति संस्कृति का संरक्षण ही है।' यह कथन उनकी अगस्त्य यात्रा के 124 साल बाद सोमवार को गंगा पार रेत पर अकृतियों के रूप में एक बार पुन: चरितार्थ हुआ। 18 से 30 वर्ष के युवाओं ने अपनी कलाकृतियों से मणिकर्णिका और अरावली के संरक्षण का स्वर मुखर किया। पांच से सात सदस्यों वाली 39 टीमों में बंटकर रेत पर रचे सृजन के संसार में विरासत को बचाते हुए विकास की हिमायत की गई। कलाकारों ने रेत में उकेरी आकृतियों से अपनी आध्यात्मिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक चिंताओं को भी अभिव्यक्ति दी। ऐसा करके उन्होंने यह नैतिक आश्वासन भी दिया कि राष्ट्र, समाज और संस्कृति के प्रति उनकी जिज्ञासा और जिजिविषा दोनों ही पर्याप्त हिलोरे ले रही है। राम छाटपा...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.