वाराणसी, जनवरी 10 -- वाराणसी, मुख्य संवाददाता। कुंभ चाहे प्रयागराज में त्रिवेणी के किनारे लगे या फिर त्रिनेत्रधारी की नगरी काशी में गंगा के किनारे, होता विशेष है। आप को लग रहा होगा कुंभ और काशी में! तो यहां जिक्र ग़ज़ल कुंभ का हो रहा है। उल्टी गंगा वाले इस शहर में काफियों, रदीफों और मिसरों की सीधी-सीधी त्रिधारा के प्रवाह में तमाम राज्यों से जुटे डेढ़ सौ से अधिक शायरों ने गोते लगाए और लगवाए। ग़ज़ल कुंभ का 17वां और काशी में पहला आयोजन शनिवार को तेलियाबाग स्थित पटेल स्मृति भवन के सभागार में आरंभ हुआ। रात नौ बजे शम्मा-ए-महफिल रौशन की गई। इसके बाद शेर-ओ-शायरी का सिलसिल आधी रात के बाद तक चलता रहा। ग़ज़ल कुंभ से चुनिंदा अशार लोग अपने-अपने साथ लेकर गए। मसलन जालौन के पुष्पेंद्र पुष्प के मिसरे। उन्होंने सुनाया 'जिंदगी से हसीं पर फिसलते रहे, और हम ब...
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