प्रकाशचंद्र गंगराड़े, सितम्बर 9 -- मां के गर्भ में मलिन भोजन के जो दोष शिशु में आ जाते हैं, उनके निवारण और शिशु को शुद्ध भोजन कराने की प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है-अन्नाशनान्मातृगमें मलाशायपि शुष्यति। शिशु को जब छह-सात माह की अवस्था में पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त प्रथम बार यज्ञ आदि करके अन्न खिलाना प्रारंभ किया जाता है, तो यह कार्य अन्नप्राशन संस्कार के नाम से जाना जाता है। इस संस्कार का उद्देश्य यह होता है कि शिशु सुसंस्कारी अन्न ग्रहण करे-आहारशुद्धौ-सत्त्वशुद्धिः। (-छान्दोग्य उपनिषद् 7/26/2) इसका मतलब है कि शुद्ध आहार से शरीर में सत्त्व गुण की वृद्धि होती है। छह-सात माह के शिशु के दांत निकलने लगते हैं और पाचन क्रिया प्रबल होने लगती है। ऐसे में जैसा अन्न खाना वह प्रारंभ करता है, उसी के अनुरूप उसका तन-मन बनता है।ये भी ...
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