डॉ. प्रणव पण्ड्या, नवम्बर 25 -- इस संसार में सारा कुछ मन का जादू है। यह हटा कि समझो सारा भ्रम मिटा। मन सब कुछ को अपने में समेट लेता है- अहंकार, इच्छाएं, कामनाएं, कल्पनाएं, आशाएं, तत्त्वज्ञान और शास्त्र। जहां कुछ जो भी सोचा जा सकता है, सोचा जा रहा है, वह मन है। जो भी जाना गया है, जो भी जाना जा सकता है, जो भी जानने लायक समझा जाता है, वह सब-का-सब मन के दायरे में है। मन की समाप्ति का मतलब है- जो जाना है, उसकी समाप्ति और जो जानना है उसकी समाप्ति। यह तो छलांग है-ज्ञानातीत में। जब मन न रहा, तो जो बचा वह ज्ञानातीत है। मन के इसी सत्य को गोस्वामी तुलसीदासजी ने अपनी रामायण में गाया है- 'गो गोचर जहां लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई॥' अर्थात इंद्रियां, इंद्रियों की पहुंच और जहां-जहां तक मन जाता है, हे भाई, तुम उस सबको माया जानना, मिथ्या समझना। महर्ष...
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