नई दिल्ली, नवम्बर 13 -- जीवन में निर्णय की आवश्यकता कब पड़ती है? यह आवश्यकता तभी होती है, जब कोई उलझन हो। जब कोई उलझन ही नहीं, तो निर्णय की भी आवश्यकता नहीं। यदि तुम्हारी मेज पर लकड़ी का कोई टुकड़ा पड़ा हो और एक मिठाई रखी हो, तो क्या तुम निर्णय करोगे कि तुम्हें क्या खाना है? निर्णय चुनाव के लिए ही होता है और चुनाव हमेशा परेशानी लाता है। इसीलिए, सभी निर्णयकर्ता परेशान रहते हैं। जब तुम उलझन में रहते हो, तब वहां स्वतंत्रता नहीं होती। याद रखो, नाटकीयता के अभाव में कृत्य सहज हो जाते हैं। तुम्हारे भीतर एक नायक भी है और एक दर्शक भी। नायक या तो असमंजस में है या निश्चयपूर्ण, लेकिन दर्शक मुस्कराता है, क्योंकि वह जानता है कि कृत्य स्वतः होते हैं। जितने अधिक तुम निर्णय लेते हो, उतने ही अधिक उलझते जाते हो; इसी कारण तुम सुख और दुख के बीच झूलते हो। इसके...