नई दिल्ली, नवम्बर 4 -- मनुष्य जीवन एषणा (अभिलाषा) से जुड़ा हुआ है। एषणा का अर्थ वह इच्छा है, जिसे कर्म का रूप देने का प्रयास किया जाता है। जब तक जीव है, तब तक उसमें एषणा भी रहती है। जीव अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर सकता, इसलिए उसे परमपुरुष की कृपा की आवश्यकता होती है। सृष्टि के सभी प्राणी, चाहे वे मनुष्य हों या अन्य जीव, तीन मूल एषणाओं से संचालित होते हैं। पहली एषणा यह है कि जीव अपने को विस्तार देना चाहता है, बढ़ना चाहता है, फैलना चाहता है, वह नहीं चाहता कि कोई उसकी इस गति में बाधा बने। दूसरी एषणा यह है कि वह आनंद, रस या भाव के सागर में बहना चाहता है। यानी प्रेम और सुख की निरंतर धारा में डूबना चाहता है। तीसरी एषणा यह है कि वह कुछ ऐसा करे, जिससे उसे अशेष आनंद मिले। यानी ऐसा आनंद, जो क्षणिक न होकर अनंत हो। ये तीनों एषणाएं जीवन की जड़ ...