नई दिल्ली, नवम्बर 16 -- फिर एक बार बम के धमाके, फिर एक बार मासूम लोगों की लाशें, पुलिस की भागदौड़ और लोगों का आक्रोश। राजनेताओं की धमकियां और बदले की आग का तांडव। अंतत: मुजरिमों को सजा देने के बाद सब चैन की सांस लेते हैं, जब तक कि अगली घटना न घटे। यह किसी फिल्म की कहानी जैसी लगती है। कहानी के किरदार बदलते हैं, लेकिन ढांचा वही है। क्या आतंकवाद के आतंक से निपटने का यही एकमात्र तरीका बचा है हमारे पास? आतंकवाद एक विकराल वृक्ष बन गया है, क्योंकि उसके पत्ते व शाखाएं तो हम काटते रहते हैं और जड़ों को सींचते हैं, अनजाने में। आतंक एक वाद बन गया है, यह सबसे खतरनाक बात है। जब कोई कृत्य दर्शन बनता है, तो उसे एक सिंहासन मिलता है। उस झंडे के नीचे लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं, वह न कोई गुनाह है, न पाप। आतंकवाद केवल राजनेताओं का पाला-पोसा राक्षस नही...
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