बगहा, जनवरी 24 -- बगहा, हमारे संवाददाता। ज्ञान, कला और विवेक की देवी सरस्वती मां की प्रतिमा विसर्जन के साथ ही नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में एक अजीब-सी ख़ामोशी उतर आई। जिन गलियों में कुछ घंटे पहले तक ढोल-नगाड़ों की गूंज, बच्चों की हंसी और "जय मां सरस्वती" के जयकारे थे, वहां अब नम आंखें और भारी मन दिखाई दिए। हाथों में फूल, अगरबत्ती और दीप लिए श्रद्धालु मां को अंतिम विदाई देने पहुंचे। वस्त्रों में सजे बच्चे, जिनकी किताबें मां के चरणों में रखी गई थीं, आज वही बच्चे मां से अगली बार जल्द लौटने की प्रार्थना करते दिखे। किसी ने कहा-"मां, परीक्षा में साथ देना", तो किसी की आंखें यह कहते-कहते भर आईं-"मां, फिर आना।" विसर्जन घाट पर जैसे हर दिल एक साथ धड़क रहा था। मूर्ति को उठाते समय युवाओं के कंधे भले मजबूत थे, लेकिन मन बेहद कोमल। ढोल की थाप धीमी पड़ती गई...
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