नई दिल्ली, दिसम्बर 9 -- मन को बलवान बनाने के लिए क्या किसी विशेष ध्यान की आवश्यकता है? जो कुछ काम करो, वह तुम्हारा नहीं है। ऐसा खयाल अपने समक्ष रखो, तो पर्याप्त है। इस ध्यान के लिए आरंभ में कठिन प्रयत्न आवश्यक है। धीरे-धीरे यह सहज और स्थिर बन जाता है। दि आत्मा का ज्ञान हो जाए, तो मनोनिग्रह करने की बात नहीं रहती। जब मन का नाश हो जाता है, तब आत्मा प्रकाशमान होती है। ज्ञानी का मन चाहे काम करे या न करे, उसके अंदर केवल आत्मा सतत विद्यमान रहती है। मन, शरीर और जगत आत्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा से अलग उनका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। वे आत्मा से भिन्न हो ही नहीं सकते। आत्मा का भान होने के बाद इन प्रतिच्छायाओं की चिंता ही क्यों करनी चाहिए? इन प्रतिच्छायाओं का आत्मा पर क्या असर पड़नेवाला है? आत्मा स्वयं प्रकाशित हृदय आत्मा स्वयं प्रकाशित हृदय में है।...
Click here to read full article from source
To read the full article or to get the complete feed from this publication, please
Contact Us.