सहारनपुर, दिसम्बर 15 -- बृजेश नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत सार कथा के दौरान भागवताचार्य आत्मानुभवी महाराज ने कहा कि शारीरिक, भौतिक और सामाजिक स्वतंत्रता के साथ-साथ अध्यात्म ज्ञान दृष्टि पर चिंतन करना भी अनिवार्य है। जब तक मनुष्य अध्यात्म ज्ञान से स्वयं को नहीं जोड़ता, तब तक न तो चरित्र निर्माण संभव है और न ही आध्यात्मिक विकास। उन्होंने कहा कि अध्यात्म ज्ञान ही मानव विकास की मूल आधारशिला है। भागवताचार्य ने प्रवचन में बताया कि ईश्वर ने भी सृष्टि की उत्पत्ति से पहले मन में विचार किया, तभी सृष्टि का निर्माण हुआ। इसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन में जो भी करता है, वह पहले मन में विचार करता है। यदि मन में अपवित्र विचार होंगे तो दुष्कर्मों में वृद्धि होगी, पापाचार बढ़ेगा और जीवन निरर्थक बन जाएगा। वहीं यदि मन में पवित्र विचार होंगे तो चरित्र का निर्माण...