लेह , फरवरी 09 -- दुनिया के सबसे ऊंचे इलाकों में से एक लेह में लगभग 3,600 मीटर पर आयोजित होने वाला समारोह 'लद्दाख बिएनाले 2026' जिसे पुनर्जीवी कला महोत्सव कहा जाता है वह 1 से 10 अगस्त तक लद्दाख के गांवों, शिक्षण स्थलों और खुले प्राकृतिक परिदृश्यों में आयोजित होगा।

'सिग्नल्स फ्रॉम अनदर स्टार' विषय पर आधारित यह बिएनाले पारंपरिक गैलरी-आधारित प्रारूप से अलग हटकर समकालीन कला को लद्दाख के पारिस्थितिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संदर्भों में प्रस्तुत करेगा। कार्यक्रम लेह-कारगिल कॉरिडोर के विभिन्न स्थलों पर आयोजित होगा, जहां कला को संस्थागत स्थलों के बजाय प्राकृतिक और सामुदायिक परिवेश में समाहित किया जाएगा।

क्यूरेटर विशाल के. डार ने कहा कि इस बिएनाले का उद्देश्य ऊंचाई वाले क्षेत्रों की वास्तविकताओं से जुड़े कलात्मक "संकेत" उत्पन्न करना है, जहां प्रत्येक कृति सामूहिक स्मृति, मौसम के पैटर्न, ऐतिहासिक व्यापार मार्गों और संसाधन दोहन जैसे विषयों से संवाद करेगी। 2026 संस्करण में श्री त्सेरिंग मोटुप सह-क्यूरेटर के रूप में उनके साथ जुड़ेंगे।

वर्ष 2023 में स्थापित लद्दाख बिएनाले को एक बार के आयोजन की बजाय दीर्घकालिक सांस्कृतिक पहल के रूप में विकसित किया जा रहा है। यह पहल नैतिक और समतामूलक क्यूरेशन, शून्य से न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव और विश्व के सबसे संवेदनशील पारिस्थितिक क्षेत्रों में से एक में सतत सहभागिता पर जोर देती है।

बिएनाले में लद्दाख और अंतरराष्ट्रीय कलाकारों को समान रूप से मंच दिया जाएगा, जिससे स्थानीय ज्ञान प्रणालियों और वैश्विक समकालीन कलात्मक अभिव्यक्तियों के बीच संवाद को बढ़ावा मिलेगा।

महोत्सव के संस्थापक राकी निकाहेतिया ने कहा कि यह पहल केवल एक उत्सव तक सीमित नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक सांस्कृतिक जिम्मेदारी की ओर सोचने का प्रयास है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य यह समझना है कि कला जलवायु, संस्कृति और समुदाय के साथ सार्थक रूप से कैसे जुड़ सकती है।

शिक्षा, सजग पर्यटन, सुगम्यता और दिव्यांग समुदायों के साथ सहभागिता बिएनाले के प्रमुख स्तंभ हैं। प्रस्तावित कार्यक्रमों में कार्यशालाएं, कलाकार रेजीडेंसी, सामुदायिक पहल और स्थानीय समुदायों के सहयोग से विकसित स्थल-विशिष्ट परियोजनाएं शामिल हैं।

इस पहल ने क्षेत्रीय सांस्कृतिक संस्थानों और सामुदायिक संगठनों के साथ साझेदारी की है, ताकि स्थानीय इतिहास और जीवन अनुभव इसकी संरचना के केंद्र में बने रहें। मानवविज्ञानी डॉ. मोनिशा अहमद ने कहा कि लद्दाख की कलात्मक परंपराएं उसके ऐतिहासिक सांस्कृतिक संगम होने को दर्शाती हैं और यह बिएनाले उसी आदान-प्रदान की विरासत को आगे बढ़ाता है।

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