नयी दिल्ली , जनवरी 14 -- राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में चल रहे विश्व पुस्तक मेला के अंतर्गत आयोजित 'फेस्टिवल ऑफ फेस्टिवल्स 3.0' ने भारत मंडपम को देश के प्रमुख साहित्यिक और सांस्कृतिक आयोजनों का साझा मंच बना दिया है। इस आयोजन का उद्देश्य देश की विविध साहित्यिक परंपराओं, विचारों और रचनात्मक स्वरों को एक साथ लाकर पाठकों, लेखकों और प्रकाशकों के बीच संवाद को मजबूत करना है।
फेस्टिवल ऑफ फेस्टिवल्स 3.0 के तहत पुस्तक लोकार्पण, पैनल चर्चा और विशेष सत्रों का आयोजन हो रहा है जिसमें देशभर से आए 100 से अधिक लेखक, विचारक और वक्ता भाग ले रहे हैं।
इस महोत्सव में पुरी लिटरेचर फेस्टिवल (पीएलएफ) ने इतिहास, स्मृति, आस्था, जेंडर और समकालीन जीवन से जुड़े विषयों पर विचारोत्तेजक सत्र प्रस्तुत किए। 'रेल्स, रिपब्लिक एंड द लाइव्स वी इनहेरिट' सत्र में भारतीय रेलवे को देश के सामाजिक और सांस्कृतिक इतिहास के जीवंत दस्तावेज के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके अलावा शहरी अकेलापन, प्रेम, स्त्रीवादी दृष्टिकोण से मिथकों की व्याख्या और प्रवासन जैसे विषयों पर भी सार्थक चर्चा हुई।
नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल ने प्राचीन नालंदा की ज्ञान परंपरा को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत किया। वैषाली सेता द्वारा संयोजित इन सत्रों में वेद, संस्कृत, योग, आयुर्वेद और भारतीय ज्ञान परंपराओं पर संवाद हुआ। वक्ताओं ने बताया कि नालंदा केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी वैश्विक ज्ञान विमर्श के लिए प्रासंगिक है।
द ग्रेट इंडियन बुक टूर के सत्रों में कथा साहित्य, लेखन प्रक्रिया और जीवन के अनुभवों से कहानियों के जन्म पर चर्चा की गई। इन सत्रों में यह समझाने का प्रयास किया गया कि साधारण जीवन के संघर्ष कैसे प्रेरक साहित्य में बदल जाते हैं और कुछ किताबें लंबे समय तक पाठकों के मन में क्यों बनी रहती हैं।
महोत्सव में शामिल आयोजक एशियन लिटरेरी सोसाइटी के मनोज कृष्णन ने कहा कि यह आयोजन एशियाई साहित्य को भारतीय पाठकों तक पहुँचाने का एक सशक्त माध्यम है। पुरी लिटरेचर फेस्टिवल के शशांक शेखर ने इसे लेखकों और पाठकों को जोड़ने वाला सबसे बड़ा मंच बताया। वहीं नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल की वैशाली सेता ने कहा कि यह मंच भारत को ज्ञान की भूमि के रूप में फिर से स्थापित करने में सहायक है।
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