मुंबई , जनवरी 05 -- पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि पहाड़ी सुरंगों के लिए पर्यावरणीय मानकों से छूट दिए जाने से न सिर्फ बड़े पैमाने पर पहाड़ों के विनाश का कारण बन सकती है बल्कि वंदे मातरम की उस भावना को कमजोर करता है-जो भूमि को जीवन और पोषण के स्रोत के रूप में पूजती है।
पर्यावरणविदों ने केंद्र सरकार के उस दावे पर भी चिंता जतायी है कि सड़क परियोजनाओं के लिए पहाड़ों के माध्यम से सुरंग बनाना पर्यावरणीय मंजूरी (ईसी) की आवश्यक नहीं है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि नीतिगत व्याख्याएं अब इस पारिस्थितिक कार्य को खतरे में डाल रही हैं, जो पहाड़ों को महत्वपूर्ण जीवन-सहायता प्रणालियों के बजाय व्यय योग्य इलाके के रूप में मानती हैं। उनका कहना है कि वंदे मातरम में "मलयज शीतलम" वाक्यांश पहाड़ों के ठंडक प्रदान करने वाले प्रभाव को संदर्भित करता है, जो उनके प्राकृतिक जलवायु नियामक की भूमिका को रेखांकित करता है तथा जल, कृषि और मानव बस्तियों को बनाए रखते हैं। उन्हाेंने ' हिल्स नहीं, कल नहीं' की अवधारणा के तहत अपनी चिंताओं से राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को भी अवगत कराया है।
पर्यावरणविदों का दावा है कि यह छूट राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा निर्धारित न्यायिक सुरक्षा उपायों को सीधे कमजोर करती है, जिसने नाजुक पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी अनिवार्य की थी। उनका तर्क है कि विस्फोट और ड्रिलिंग से सुरंग निर्माण अक्सर खनन से अधिक विनाशकारी होता है क्योंकि यह चट्टान परतों को अस्थिर करता है, भूजल प्रणालियों को बाधित करता है और जैव विविधता को नष्ट करता है।
पर्यावरण समूहों का तर्क है कि सरकार का रुख प्रभावी रूप से पहाड़ कटाई और सुरंग निर्माण को पर्यावरणीय जांच के ढांचे से बाहर रखता है, ठीक ऐसे समय जब हिमालय, अरावली, सह्याद्रि और पूर्वी घाट जैसे नाजुक पहाड़ी तंत्रों पर तेजी से बुनियादी ढांचा विस्तार के कारण दबाव बढ़ रहा है। अरावली श्रृंखला में अवैध खनन और पहाड़ विनाश पर लोगों ने पहले ही देश के शीर्ष न्यायालय का ध्यान आकर्षित किया है, जिसने बार-बार अंधाधुंध खुदाई से होने वाले पारिस्थितिक और सुरक्षा जोखिमों को चिह्नित किया है।
यह मुद्दा नेटकनेक्ट फाउंडेशन द्वारा दाखिल की गई कई सूचना के अधिकार (आरटीआई) अर्जियों के बाद तीव्र रूप से सामने आया है, जिनमें खुलासा हुआ कि पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 के तहत पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील पहाड़ी श्रृंखलाओं के माध्यम से बड़े जुड़वां सुरंगों को भी बिना पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के आगे बढ़ाया जा सकता है। वन भूमि के मोड़ की मंजूरी मिल सकती है, लेकिन सुरंग निर्माण गतिविधि की खुद की पर्यावरणीय जांच को दरकिनार कर दिया जाता है।
नेटकनेक्ट निदेशक बी एन कुमार ने कहा, "यह पर्यावरणीय परित्याग के समान है," उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि पहाड़ों को जीवन की आवश्यक प्राकृतिक संपत्तियों के बजाय निर्जीव बाधाओं के रूप में माना जा रहा है। पहाड़ जल प्रवाह को नियंत्रित करते हैं, जलवायु को स्थिर रखते हैं और समुदायों की रक्षा करते हैं, और एक बार अस्थिर हो जाने पर क्षति स्थायी होती है।
श्री कुमार ने कहा कि यह व्याख्या नकारात्मक है जो "सुरंग निर्माण" के बहाने खनन और उत्खनन को अनुमति देती है और इस तरह पर्यावरणीय जांच को पूरी तरह दरकिनार कर देती है। जो सुरक्षा न्यायालयों ने अनिवार्य मंजूरी के माध्यम से प्रदान की थी, वह कार्यकारी व्याख्या से शून्य हो जाने का जोखिम है।
पर्यावरण कार्यकर्ता ज्योति नाडकरनी ने कहा कि अगर आज पहाड़ों का बलिदान दिया गया, तो लागत न केवल पर्यावरणीय होगी, बल्कि सभ्यतागत भी, जो आने वाली पीढ़ियों द्वारा चुकाई जाएगी।
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