जयपुर , फरवरी 07 -- राजस्थान उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को "नीच" जैसे सामान्य अपमानजनक शब्द कह देने मात्र से एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम अपने-आप लागू नहीं होता।

न्यायाधीश वीरेन्द्र कुमार ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम तभी लगाया जा सकता है जब यह साबित हो कि अपमान खास तौर पर जाति के आधार पर किया गया था और आरोपी को पीड़ित की जाति की जानकारी थी।

यह मामला वर्ष 2011 में आईआईटी जोधपुर से जुड़े एक विवाद से संबंधित है। उस समय सरकारी अधिकारी अतिक्रमण की जांच के लिए मौके पर पहुंचे थे। जांच के दौरान कुछ लोगों ने इसका विरोध किया और कथित रूप से अधिकारियों को "नीच", "भिखारी" जैसे शब्द कहे। अधिकारियों ने इसे जातिगत अपमान मानते हुए प्राथमिकी दर्ज करवाई और एससी/एसटी अधिनियम की धारा के साथ आईपीसी की धाराएँ भी जोड़ी गईं।

आरोपियों ने उच्च न्यायालय में याचिका देते हुए कहा कि उन्हें अधिकारियों की जाति के बारे में जानकारी नहीं थी और बोले गए शब्द जाति का संकेत नहीं देते। उन्होंने यह भी कहा कि घटना के समय कोई स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था, इसलिए इसे जातिगत अपमान नहीं माना जा सकता।

उच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान पाया कि इस्तेमाल किए गए शब्द किसी विशेष जाति की ओर संकेत नहीं करते और न ही ऐसा कोई प्रमाण है कि आरोपियों को अधिकारियों की जाति के बारे में जानकारी थी। न्यायालय ने कहा कि एससी/एसटी अधिनियम लगाने के लिए जाति-आधारित अपमान का स्पष्ट और ठोस प्रमाण होना आवश्यक है।

इस आधार पर न्यायालय ने एससी/एसटी अधिनियम के तहत लगाए गए आरोपों को रद्द कर दिया। हालांकि, सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी से रोकने और उनसे धक्का-मुक्की से संबंधित आईपीसी की धाराएँ बनी रहेंगी और इन्हीं धाराओं पर मामला आगे चलेगा।

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