नयी दिल्ली , जनवरी 09 -- भारत में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के अर्थशास्त्री क्रिस्टोफर गौरोवे का मानना है कि तमाम वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत अपनी घरेलू मांग के दम पर आने वाले समय में भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहेगा।
श्री गौरोवे ने यहां गुरुवार को एक संवाददाता सम्मेलन में एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि भारत दुनिया के कई अन्य देशों जितनी खुली अर्थव्यवस्था नहीं है। यह बाहरी कारकों के प्रति उतना संवेदनशील नहीं है। यही कारण है कि पहले भी वैश्विक चुनौतियां का इसने मजबूती से सामना किया है और आगे भी करता रहेगा। उन्होंने कहा कि भारत इस समय "लाभ की स्थिति" में है।
उल्लेखनीय है कि सरकार के पहले अग्रिम अनुमान के अनुरूप संयुक्त राष्ट्र की गुरुवार को जारी 'विश्व आर्थिक स्थिति एवं परिदृश्य' रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की वृद्धि दर 7.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है। साथ ही, अगले दो साल भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में क्रमशः 6.6 प्रतिशत और 6.7 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान जताया गया है।
संयुक्त राष्ट्र के अर्थशास्त्री ने कहा कि भारत में पारिवारिक खर्च ऊंचा बना हुआ है, सार्वजनिक निवेश मजबूत है और ब्याज दर कम है। ये सभी कारक विकास को गति दे रहे हैं। हालांकि अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर ऊंचे आयात शुल्क और वैश्विक अनिश्चितताओं का दबाव भी है।
घरेलू चुनौतियों के बारे में श्री गौरोवे ने कहा कि दुनिया के कई अन्य देशों की तरह भारत भी सार्वजनिक ऋण के ऊंचे स्तर की समस्या से जूझ रहा है। देश के राजस्व का एक बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने पर खर्च हो जाता है। इसके अलावा बेरोजगारी भी एक समस्या है। उन्होंने कहा कि ऋण के बोझ का असर हर देश पर अलग-अलग होता है, और भारत पर दूसरे दक्षिण एशिया देशों के मुकाबले दबाव कम है। कई देशों को इसके कारण अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद मांगनी पड़ी है।
भारत सरकार का ऋण बनाम जीडीपी अनुपात पिछले वित्त वर्ष में 57 प्रतिशत से ऊपर था। सरकार ने इसे चालू वित्त वर्ष में 56.1 प्रतिशत तक सीमित रखने का लक्ष्य तय किया है। वित्त वर्ष 2018-19 में जीडीपी की तुलना में ऋण घटकर 48.9 प्रतिशत रह गया था, लेकिन कोविड-19 महामारी के बाद यह बढ़कर 61.4 प्रतिशत पर पहुंच गया था।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2025-26 का बजट पेश करते हुए बताया था कि कुल व्यय का 20 प्रतिशत हिस्सा सरकार ऋणों के ब्याज की अदायगी पर खर्च करेगी।
श्री गौरोवे ने कहा कि बदलती वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों में अब दुनिया के कई देश अपने इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर विनिर्माण केंद्रों में विविधता ला रहे हैं जिसका फायदा भारत को मिल रहा है।
एक अन्य प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि रिजर्व बैंक आगे भी रेपो दरों में कटौती जारी रख सकता है, हालांकि यह पिछले साल (2025) से कम रहने की संभावना है। केंद्रीय बैंक ने पिछले साल चार बार में रेपो दर में कुल 1.25 प्रतिशत की कटौती की थी।
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