नयी दिल्ली , जनवरी 16 -- राजधानी दिल्ली में शुक्रवार को इंटर फेथ हार्मनी फाउंडेशन ऑफ इंडिया द्वारा "यूनिटी फॉर पीस एंड प्रोग्रेस" विषय पर इंटरफेथ डायलॉग (अंतरधार्मिक संवाद) का आयोजन किया गया।

इस संवाद में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी डॉ. कृष्ण गोपाल ने भारत की असली ताकत को संवाद और समावेश की परंपरा बताते हुए पंडित जवाहरलाल नेहरू के 24 जनवरी 1948 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दिए गए भाषण का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद को धर्म से ऊपर रखने की सोच ही भारत को जोड़ती है। उन्होंने यह भी कहा कि अराजक तत्वों (फ्रिंज एलिमेंट्स) समस्या नहीं, बल्कि समाज की गहरी बीमारियों के लक्षण हैं, जिनका समाधान संवाद से ही संभव है। साथ ही उन्होंने 'हिंदुत्व' की जगह 'हिंदूनेस' शब्द को अधिक समावेशी बताया।

इस संवाद का नेतृत्व फाउंडेशन के अध्यक्ष ख्वाजा इफ्तिखार अहमद ने किया, जिसमें विभिन्न धर्मों, विचारधाराओं और संस्थानों से जुड़े प्रमुख वक्ताओं ने भाग लिया।

आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी रामलाल ने कहा कि देश के किसी एक हिस्से में हुई कुछ घटनाओं को पूरे देश की पहचान से जोड़ना गलत है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत जैसे विविध समाज में संवाद ही स्थायी समाधान है।

सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट जनरल ज़मीरुद्दीन शाह ने सोशल मीडिया को नफरत फैलाने का सबसे खतरनाक माध्यम बताया और कहा कि नाम पूछकर हिंसा की घटनाएँ गंभीर चिंता का विषय हैं। उन्होंने संगठनों से अराजक तत्वों को नियंत्रित करने की अपील की।

पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग ने अल्पसंख्यकों पर हमलों और ऐसे मामलों में सत्ता की चुप्पी पर सवाल उठाया। उन्होंने इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किए जाने और समाज में बढ़ते अविश्वास पर चिंता जताई।

संवाद में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि नफरत का मुकाबला संवाद, आपसी सम्मान और जिम्मेदार नेतृत्व से ही संभव है। यही रास्ता भारत को शांति, एकता और प्रगति की ओर ले जा सकता है।

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