पटना , अप्रैल 28 -- अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), पटना के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग ने एक ऐतिहासिक शोध के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि हीट स्ट्रोक (लू) से मृत्यु के पीछे मस्तिष्क का एक विशेष केंद्र और विशिष्ट रक्त वाहिकीय क्षति निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

यह खोज न केवल चिकित्सा विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि उन हजारों परिवारों के लिए भी उम्मीद की किरण है जो अपने प्रियजनों की मृत्यु के बाद मुआवजा, बीमा और सरकारी लाभ पाने के लिए स्पष्ट कारण की प्रतीक्षा करते हैं।

"ए हाइपोथैलेमस सेंटर्ड पैथोजेनेसिस ऑफ हीट स्ट्रोक डेथ्स- ए पोस्टमॉर्टम बेस्ड ह्यूमेन स्टडी" शीर्षक से प्रकाशित यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल मेडिको-लीगल जर्नल के नवीनतम अंक में शामिल किया गया है। वर्ष 2024 में पटना क्षेत्र में 48degC तक तापमान, 95 प्रतिशत तक आर्द्रता और पांच से आठ घंटे तक लगातार गर्मी के संपर्क में आए मामलों के विस्तृत पोस्टमॉर्टम अध्ययन पर आधारित यह शोध, चिकित्सा जगत में एक नई दिशा प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, पटना के फोरेंसिक मेडिसिन विभाग ने एनाटॉमी और पैथोलॉजी विभागों के सहयोग से पूरा किया।

शोध के प्रमुख लेखक और फोरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. अशोक कुमार रस्तोगी के अनुसार "मानव शरीर का तापमान नियंत्रित करने वाला अग्र हाइपोथैलेमस, हीट स्ट्रोक के दौरान सबसे अधिक प्रभावित होता है। इसमें होने वाली संरचनात्मक क्षति ही मृत्यु का केंद्रीय कारण बनती है। अब यह क्षति फोरेंसिक जांच में निर्णायक साक्ष्य के रूप में उपयोग की जा सकती है।"यह अध्ययन केवल एक वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं बल्कि एक समाधान भी है। एक ऐसा समाधान जो वर्षों से चली आ रही उस दुविधा को खत्म करता है जिसमें पोस्टमॉर्टम के बावजूद हीट स्ट्रोक (लू) से मृत्यु का स्पष्ट कारण निर्धारित करना कठिन होता था। अब चिकित्सक अधिक आत्मविश्वास और वैज्ञानिक आधार के साथ मृत्यु का कारण निर्धारित कर सकेंगे।इस शोध का प्रभाव केवल प्रयोगशाला या पोस्टमॉर्टम रूम तक सीमित नहीं रहेगा। यह सीधे समाज के उस वर्ग को राहत देगा जो अपनों को खोने के बाद न्याय और अधिकारों के लिए संघर्ष करता है। मृत्यु का स्पष्ट कारण तय होने से मुआवजा, बीमा दावों और सरकारी लाभों की प्रक्रिया अधिक सरल, पारदर्शी और त्वरित होगी।

हीटवेव (लू) के इस दौर में यह शोध एक चेतावनी भी है और एक दिशा भी कि प्रकृति के बढ़ते तापमान के साथ हमें विज्ञान की रोशनी में समाधान तलाशने ही होंगे।

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