शिमला , नवंबर 11 -- हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय ने भारतीय वन अधिनियम (आईएफए) की व्याख्या में अस्पष्टता की ओर ध्यान दिलाते हुए पुलिस तथा वन अधिकारियों के अपराधियों को गिरफ्तार करने और उन पर मुकदमा चलाने के अधिकारों से संबंधित एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न को एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया है।

इस निर्णय का लंबित सैकड़ों वन अपराध मामलों, विशेष रूप से लकड़ी और अन्य वन उत्पादों की अवैध कटाई और परिवहन से संबंधित मामलों पर प्रभाव पड़ सकता है।

न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम प्रेमचंद एवं अन्य मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत ने पहले हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम सतपाल सिंह मामले का हवाला देते हुए भारतीय वन अधिनियम की धारा 41 और 42 के तहत अपराधों को कम गंभीर और गैर-जमानती माना था।

अदालत ने कहा कि पहले के फैसले में वन अधिनियम की धारा 64 पर विचार नहीं किया गया था, जो पुलिस अधिकारियों को किसी भी ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार देती है जिस पर वन अपराध में शामिल होने का उचित संदेह हो।

हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित