शिमला , जनवरी 07 -- हिमाचल प्रदेश एक तरफ स्मार्ट क्लास, कृत्रिम बुद्धिमता (एआई) और डिजिटल लर्निंग के माध्यम से शैक्षिक सुधारों को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन दूसरी तरफ जनजातीय क्षेत्र के छात्रों को मिलने वाली छात्रवृति उपेक्षा की एक अलग ही कहानी बताती है।
दशकों पुरानी एक योजना के तहत, जनजातीय क्षेत्रों में कक्षा एक से आठवीं तक के छात्रों को प्रति वर्ष केवल 80 रुपये मिलते हैं, जो मात्र 6.66 रुपये प्रति माह है। लाहुल-स्पीति, किन्नौर और अन्य अधिसूचित जनजातीय क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में लागू यह योजना केवल उन छात्रों के लिए उपलब्ध है जिन्हें कोई अन्य छात्रवृत्ति नहीं मिलती है।
वर्षों से चली आ रही एक 'पारंपरिक सहायता योजना' कह कर शिक्षा विभाग इसका बचाव करता है। हालांकि, वास्तविकता यह है कि 80 रुपये में बुनियादी स्टेशनरी भी नहीं खरीदी जा सकती, जो जनजातीय शिक्षा के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता की गंभीरता पर सवाल उठाती है। यह मुद्दा हिमाचल प्रदेश में करीब 600 करोड़ रुपये के बड़े छात्रवृत्ति घोटाले की पृष्ठभूमि में और भी चिंताजनक हो जाता है, जिसने हाल के वर्षों में राज्य को हिलाकर रख दिया था।
अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अल्पसंख्यक छात्रों के लिए निर्धारित छात्रवृत्ति के दुरुपयोग और हेरफेर से जुड़े इस घोटाले ने राज्य की निगरानी और जवाबदेही तंत्र में गहरी खामियों को उजागर कर दिया है। सैकड़ों करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के बावजूद वास्तविक लाभार्थियों के बड़े वर्ग को या तो कम भुगतान किया गया या बाहर रखा गया या पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया।
शिक्षा कार्यकर्ताओं का कहना है कि एक तरफ छोटी योजनाओं में प्रतीकात्मक रूप से छोटी राशि मिलती है, तो दूसरी ओर बड़ी छात्रवृति योजनाएं घोटालों के चपेट में आ जाती हैं।
ज्ञान विज्ञान समिति के सदस्य जिया नंद शर्मा ने कहा कि 600 करोड़ रुपये के घोटाले और अपरिवर्तित 80 रुपये की वार्षिक छात्रवृत्ति के बीच का अंतर गलत प्राथमिकताओं और कमजोर शासन को दर्शाता है। उन्होंने कहा, "एक तरफ छात्रों का पैसा हड़प लिया जाता है, तो दूसरी तरफ वास्तविक जनजातीय छात्रों को कल्याण के नाम पर मामूली रकम दी जाती है।"स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली ने स्वीकार किया कि यह योजना पुरानी हो चुकी है और सरकार को इस योजना को युक्तिसंगत बनाने का प्रस्ताव भेजा गया है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डॉ. अरुण शर्मा ने शिक्षा क्षेत्र में, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और छात्र-उन्मुख योजनाओं में फैले भ्रष्टाचार पर गंभीर चिंता जताई है। राज्य स्तरीय संगठनों के सर्वेक्षणों ने भी संकेत दिया है कि लाभ अक्सर लक्षित लाभार्थियों तक पहुँचने में विफल रहते हैं।
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