मथुरा , जनवरी 10 -- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने समाज में व्याप्त भेदभाव को समाप्त करने और राष्ट्र निर्माण में 'भक्ति' की भूमिका पर जोर दिया है।

वृंदावन में आयोजित एक संत समागम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि संपूर्ण हिंदू समाज एक है और इसमें जाति, भाषा या पंथ के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव राष्ट्र के लिए घातक है।

अपने संबोधन में भागवत ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि हिंदू समाज कभी किसी शत्रु की वीरता या बल से नहीं हारा। उन्होंने जोर देकर कहा, "जब-जब हमारी पराजय हुई, उसका एकमात्र कारण आपसी फूट और भेदभाव था।" उन्होंने समाज से आह्वान किया कि केवल भाषणों और कार्यक्रमों तक सीमित न रहकर, आचरण में बदलाव लाएं। हर हिंदू के घर में समाज के हर वर्ग के मित्र होने चाहिए और उनके बीच पारिवारिक संवाद व सहभोज होना चाहिए।

भक्ति को एक महान शक्ति बताते हुए सरसंघचालक ने कहा कि बिना भक्ति के ज्ञान 'रावण' के अहंकार जैसा हो जाता है और बिना भक्ति के कर्म 'विक्षिप्त' यानी पागलों जैसा हो जाता है। उन्होंने कहा कि भारत की शक्ति उसकी आध्यात्मिक जड़ों में है, जिसने 500 वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बाद भी सनातन धर्म को अक्षुण्ण रखा।

मोहन भागवत ने 'पंच परिवर्तन' का जिक्र करते हुए कुटुंब प्रबोधन और पर्यावरण संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने महाभारत की एक कथा के माध्यम से समझाया कि कैसे धैर्य और शांति से बड़ी से बड़ी आसुरी शक्तियों को हराया जा सकता है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि हिंदू समाज एकजुट होकर अपनी सात्विक शक्ति को जागृत करता है, तो अगले 20-30 वर्षों में भारत को 'विश्व गुरु' और 'धर्म राष्ट्र' बनने से कोई नहीं रोक सकता।

शताब्दी महोत्सव में वृंदावन के अनेक प्रमुख संतों की गरिमामयी उपस्थिति रही। कार्यक्रम में संत सुतीक्ष्ण दास महाराज, ज्ञान आनंद महाराज, राजेंद्र दास जी महाराज, साध्वी ऋतंभरा सहित संत ज्ञान आनंद तथा वृंदावन नगर के अन्य प्रमुख संत उपस्थित रहे। सभी संतों ने धर्म, संस्कृति और समाज को जोड़ने वाले विचारों पर अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

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