नयी दिल्ली , जनवरी 10 -- भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों को मजबूती प्रदान करने वाले पद्मश्री सम्मानित प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी ने कहा है कि हिंदी भाषा में वह क्षमता है कि एक दिन यह संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बन सकती है।
प्रो मिजोकामी ने भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (आईसीसीआर) द्वारा शनिवार को आयोजित विश्व हिंदी दिवस कार्यक्रम में एक बार फिर यह संदेश दिया कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं रही, बल्कि वैश्विक भाषा बनती जा रही है। भारत-जापान सांस्कृतिक संबंधों को मजबूती देने वाले प्रो मिजोकामी को वैश्विक हिंदी के सबसे सशक्त समर्थकों में गिना जाता है।
विश्व हिंदी दिवस मंच से अपने विचार रखते हुए प्रो. मिज़ोकामी ने कहा, "भारत को समझने के लिए हिंदी को समझना जरूरी है। हिंदी केवल एक भाषा नहीं है, बल्कि भारत की संस्कृति, समाज और सोच को जानने की कुंजी है।" उनके अनुसार भाषा केवल बोलने का साधन नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की आत्मा होती है और हिंदी उस आत्मा को विश्व स्तर पर व्यक्त करने में सक्षम है।
जापानी विद्वान, भाषाविद् और ओसाका विश्वविद्यालय के मानद प्रोफेसर प्रो मिजोकामी ने अपना पूरा जीवन हिंदी और छह अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन, शिक्षण और प्रचार में समर्पित किया है। उनके इसी योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2018 में पद्मश्री सम्मान से नवाजा था।
आईसीसीआर महानिदेशक सुश्री के नंदिनी सिंगला ने कहा, "प्रोफेसर तोमियो मिजोकामी भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक मित्रता के जीवंत प्रतीक हैं। हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए उनका समर्पण यह साबित करता है कि भाषा देशों के बीच रिश्तों की सबसे मजबूत नींव होती है।"प्रो मिजोकामी का योगदान जापान में हिंदी, पंजाबी और अन्य भारतीय भाषाओं को अकादमिक पहचान दिलाने में ऐतिहासिक रहा है। उनके प्रयासों से जापान के विश्वविद्यालयों में भारतीय भाषाओं की पढ़ाई शुरू हुई और भारत की संस्कृति, साहित्य और दर्शन को नयी पहचान मिली।
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