नैनीताल , दिसम्बर 19 -- उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने उत्तराखंड लोक सेवा आयोग (यूकेपीसीएस) को उत्तराखंड ज्यूडिशियल सर्विसेज सिविल जज (जूनियर डिवीजन) प्रारंभिक परीक्षा, 2023 के नतीजों को फिर से गणनाकरने के निर्देश दिये है। अदालत ने एक सवाल के मूल्यांकन में गलती और दूसरे में अस्पष्टता पाई गई है।
न्यायाधीश रविंद्र मैठाणी और न्यायमूर्ति आलोक महरा की युगलपीठ ने यह आदेश याचिकाकर्ता सूर्यांश तिवारी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने 31 अक्टूबर, 2025 को आयोग द्वारा घोषित अंतिम परिणाम को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता मुख्य परीक्षा के कट-ऑफ से बहुत कम अंकों से चूक गया था और उसने आरोप लगाया था कि आधिकारिक उत्तर पुस्तिका (आंसर-की) में गलत जवाब और एक सवाल को गलत तरीके से हटाने के कारण उसे महत्वपूर्ण अंक गंवाने पड़े।
पीठ ने अंतिम सुनवाई के बाद विगत 09 दिसंबर को निर्णय सुरक्षित रखा लिया था और कल फेसला सुनाया गया। आदेश की प्रति शुक्रवार को मिली। नतीजों के अनुसार, ओपन कैटेगरी के लिए कट-ऑफ 162.12 अंक था, जबकि याचिकाकर्ता को 161.11 अंक मिले, जिससे वह आगामी 19 जनवरी से शुरू होने वाली मुख्य परीक्षा के लिए अयोग्य घोषित हो गया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अभिजय नेगी ने कहा कि याचिकाकर्ता प्रारंभिक परीक्षा में शामिल हुआ था। उसे प्रश्न पुस्तिका सीरीज 'ए' दी गई थी और उन्होंने प्रश्न 120, 132, 145 और 158 के मूल्यांकन और प्रश्न 129 को हटाने पर आपत्ति जताई थी जबकि अनंतिम आंसर-की 4 सितंबर, 2025 को प्रकाशित की गई थी, 30 सितंबर को एक संशोधित आंसर-की जारी की गई, जिसके एक महीने बाद परिणाम घोषित किए गए।
हाई कोर्ट ने माना कि मुस्लिम कानून के तहत एक वैध वक्फ की आवश्यक शर्तों से संबंधित प्रश्न 120 के लिए कमीशन द्वारा दिया गया उत्तर गलत था। कानूनी स्थिति को देखते हुए, सही उत्तर विकल्प (डी)- "उपरोक्त सभी" था।
सवाल 145 पर, जो घर में घुसने के लिए दीवार में छेद करके किए गए अपराध से जुड़ा था, उच्च न्यायालय ने कमीशन के जवाब से असहमति जताई। भारतीय दंड संहिता की धारा 445 से जुड़े उदाहरण पर भरोसा करते हुए, बेंच ने कहा कि यह काम सीधे तौर पर "घर तोड़ने" के बराबर था, जिससे ऑप्शन (सी) सही जवाब बन गया।
अदालत ने सवाल 158 की भी जांच की, जिसमें इलेक्ट्रॉनिक सबूतों की स्वीकार्यता से जुड़े मामलों के बारे में पूछा गया था। कोर्ट ने पाया कि "अनवर पी.वी. बनाम पी.के. बशीर" और "ए.पी. खोटकर बनाम के.के. गोरंट्याल" दोनों मामलों में इस मुद्दे पर बात की गई थी, जिससे सवाल अस्पष्ट हो गया था। सुनवाई के दौरान कमीशन के वकील ने माना कि दो सही जवाब थे। बेंच ने कहा कि ऐसे सवाल को मूल्यांकन के दौरान हटा दिया जाना चाहिए था और इसे हटाने का निर्देश दिया।
हिंदी हिन्दुस्तान की स्वीकृति से एचटीडीएस कॉन्टेंट सर्विसेज़ द्वारा प्रकाशित