नयी दिल्ली , नवंबर 18 -- बंगलादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को मौत की सजा सुनाए जाने के परिप्रेक्ष्य में दक्षिण एशिया के राजनीतिक हलकों में दो बड़े सवाल उठ रहे हैं कि क्या भारत उन्हें बंगलादेश को प्रत्यर्पित करेगा और भविष्य में बंगलादेश के साथ आगे क्या होगा, जो पहले से ही राजनीतिक एवं आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
बंगलादेश सरकार की ओर से सुश्री हसीना के प्रत्यर्पण के आह्वान के जवाब में भारत ने इस मांग को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया है और केवल इतना कहा है कि उसने सुश्री हसीना के संबंध में बंगलादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के सुनाए गये फैसले पर ध्यान दिया है। इस तरह से बंगलादेश को भारत सरकार का संदेश स्पष्ट प्रतीत होता है "आप अपनी इच्छानुसार कोई भी मांग रख सकते हैं, लेकिन भारत कोई फैसला अपने तरीके से ही लेगा। "विदेश मंत्रालय के पूर्व सचिव एवं बंगलादेश में भारतीय उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने बताया कि भारत ने बंगलादेश को पहले ही स्पष्ट रूप से बता दिया है कि द्विपक्षीय प्रत्यर्पण संधि में एक छूट खंड शामिल है जो राजनीतिक या राजनीतिक रूप से प्रेरित निर्णयों का सामना कर रहे व्यक्तियों के प्रत्यर्पण पर रोक लगाता है।
मनोहर पर्रिकर-रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान की शोध अध्येता डॉ. स्मृति एस. पटनायक ने इस पर सहमति जताते हुए कहा, "अगर हम प्रत्यर्पण के मुद्दे पर बंगलादेश और भारत के दो बयानों को पढ़ें, तो ऐसा लगता है कि दोनों एक-दूसरे से अलग बात कर रहे हैं।" उन्होंने कहा कि भारत किसी भी महत्वपूर्ण राजनीतिक कदम पर विचार करने से पहले बंगलादेश में निर्वाचित सरकार के सत्ता में आने का इंतज़ार करेगा, हालांकि नियमित व्यापार और लोगों के बीच संपर्क अप्रभावित रहेंगे।
गौरतलब है कि अपने देश में उथल-पुथल या युद्ध से भागकर आए राष्ट्राध्यक्षों और उनके परिवारों को शरण देने का भारत का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 1950 में नेपाल के राजा त्रिभुवन ने भारत में शरण ली, जिससे सत्तारूढ़ राणा शासन के विरुद्ध जन विद्रोह भड़क उठा और राजशाही पुनः सत्ता में आ गई। इसी प्रकार 1959 में भारत ने 14वें दलाई लामा को राजनीतिक शरण दी और चीनी शासन से बचकर भाग रहे हज़ारों तिब्बतियों को शरण दी। वर्ष 1996 में तालिबान के उदय के बाद भारत ने अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नजीबुल्लाह के परिवार को शरण देने की पेशकश की थी, जिनकी तालिबान ने हत्या कर दी थी और तब से यह परिवार दिल्ली में रह रहा है।
विश्लेषकों का कहना है कि बंगलादेश का नवीनतम घटनाक्रम उसके पहले से ही नाज़ुक राजनीतिक परिदृश्य को और अस्थिर तथा निवेशकों के विश्वास को कमज़ोर कर सकते हैं।
विश्लेषकों ने मुकदमे की प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी चिंता जताते हुए कई प्रक्रियागत खामियों की ओर इशारा किया है।उन्होंने कहा कि बंगलादेश सरकार ने बचाव पक्ष के वकील की नियुक्ति की, लेकिन ब्रिटेन सहित उन अंतरराष्ट्रीय वकीलों को अनुमति देने से इनकार कर दिया जिन्हें अवामी लीग सुश्री हसीना के लिए नियुक्त करना चाहती थी। बचाव पक्ष को आपत्तियाँ दर्ज करने या प्रस्तुतियाँ तैयार करने के लिए भी बहुत कम समय दिया गया था। उन्होंने कहा, "नतीजतन यह फैसला अपने आप में त्रुटिपूर्ण है।"श्री चक्रवर्ती ने कहा कि बंगलादेश बढ़ती कीमतों, बेरोज़गारी और तेज़ी से धीमी होती आर्थिक वृद्धि के कारण गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इसके अलावा वहाँ भीड़तंत्र, सड़कों पर अराजकता और राजनीतिक दलों के बीच गहराता आंतरिक कलह है। उनका मानना है कि बंगलादेश में राजनीतिक उथल-पुथल अब तेज होगी । उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से प्रतिद्वंद्वी बंगलादेश नेशनल पार्टी का यह डर और गहरा सकता है कि जमात-ए-इस्लामी उसके समर्थन आधार को कम कर सकती है और यह चिंता आने वाले महीनों में राजनीतिक गठजोड़ को नया रूप दे सकती है।
श्री पटनायक ने कहा, "यह फ़ैसला ऐसे समय में आया है जब अगस्त 2024 के आंदोलन के बाद से अवामी लीग में फिर से जान आ गयी है। जिस पार्टी ने बांग्लादेश को आजादी दिलाई थी, वह तेज़ी से सक्रिय हो गयी है और पूरे देश में प्रदर्शन आयोजित कर रही है। मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के सदस्यों की ओर से गठित नवोदित राजनीतिक दल एनसीपी द्वारा अवामी लीग के गढ़ गोपालगंज में मार्च निकालने की कोशिश के बाद इसकी नयी राजनीतिक ऊर्जा शुरू हुयी।
नयी दिल्ली में साउथ ब्लॉक के शीर्ष अधिकारियों ने कहा कि भारत घटनाक्रमों पर कड़ी नज़र रखेगा क्योंकि बंगलादेश कानूनी विवादों, सड़कों पर अशांति और अनिश्चित राजनीतिक परिवर्तन से चिह्नित एक अस्थिर दौर में प्रवेश कर रहा है।
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