नयी दिल्ली , दिसम्बर 03 -- कांग्रेस ने कहा है कि मोदी सरकार शुरु से ही निजता पर सेंध लगाने का प्रयास करती रही है और इसके लिए कई बार उसने प्रयास भी किए और हर बार पकड़ी गयी और अब 'संचार साथी' ऐप मोबाइल पर लगाकर लोगों के निजी जीवन में झांकने का प्रयास कर रही है।

कांग्रेस संचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने बुधवार को यहां पार्टी मुख्यालय में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि भाजपा ने 2014 में घर-घर मोदी का नारा दिया था। इस पार्टी की सरकार अब हर मोबाइल में 'संचार साथी' ऐप लगाकर जासूसी करना चाहती है। सरकार ने एक लिखित आदेश दिया है जिसके माध्यम से हर मोबाइल में 'संचार साथी' नाम का ऐप प्री-लोडेड होगा। मगर संचार मंत्री मौखिक तौर पर कह रहे हैं- ये ऐप डिसेबल हो सकता है लेकिन भाजपा की कथनी और करनी में हमेशा अंतर रहा है।

उन्होंने कहा कि सरकार को आम जनता के मोबाइल में घुसने का अधिकार नहीं है। भाजपा को याद रखना होगा कि उसकी सरकार में करोड़ों लोगों का आधार का डेटा लीक हुआ है और अब हर फोन में घुसना चाहती है। उनका कहना था कि मोदी सरकार निजता के हनन को लेकर शुरु से ही बहुत उत्सुक रही है और इसी का परिणाम था कि 2017 में उच्चतम न्यायालय में निजता को मौलिक अधिकार मानने के विरोध में खड़ा होना पड़ा और फिर 2018 में 10 एजेंसियों को बिना न्यायिक निगरानी के किसी भी कंप्यूटर से जानकारी इंटरसेप्ट करने का अधिकार दे दिया गया। फिर डीएनए प्रोफाइलिंग बिल लाने की कोशिश कर सोशल मीडिया हब और डिजिटल बातचीत पर निगरानी की तैयारी हुई और 2019 में पेगासस जासूसी कांड में विपक्षी नेताओं, पत्रकारों, न्यायाधीशों और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रियों की भी जासूसी की गई।

कांग्रेस नेता ने कहा कि 2020 में नमो ऐप के तहत कई व्हिसलब्लोअर्स और पत्रकारों के निजी डेटा के लीक और उसके दुरुपयोग की बात सामने आई और 2021 में नागरिकों की निजी जानकारी और उनका डेटा निजी कंपनियों को बेचकर 100 करोड़ रुपये से अधिक कमाए। साल 2023 में सूचना का अधिकार आरटीआई कानून जानबूझकर कमजोर कर दिया गया और 2025 में अधिनियम में बदलाव कर खुद को ईमेल, क्लाउड अकाउंट, मैसेजिंग ऐप, सोशल मीडिया, ऑनलाइन बैंकिंग और यहां तक कि उपकरणों तक की छानबीन का अधिकार दे दियाश्री खेड़ा ने सरकार से सवाल किया कि मोदी सरकार हर नागरिक के फ़ोन में जबरन ऐप क्यों ठूंस रही है और सरकार ने इस घातक आदेश पर कोई सार्वजनिक परामर्श किया है। उनका कहना था कि 80 करोड़ डिजिटल नागरिकों की सहमति मान लेने का अधिकार सरकार को किसने दिया और नागरिकों के अपने साथी, परिवार, या मित्रों से क्या बात करते हैं, यह जानने की इच्छा सरकार में किस वजह से पैदा हुई है।

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