नयी दिल्ली , नवंबर 06 -- विमानन उद्योग और तेल विपणन कंपनियों के विशेषज्ञों की राय में हरित विमान ईंधन की ऊंची कीमत इसे अपनाने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बनकर सामने आ रही है।

उद्योग महासंघ फिक्की द्वारा आयोजित हरित विमान ईंधन भारत शिखर बैठक में दो अलग-अलग सत्रों में विशेषज्ञों ने कहा कि देश में पारंपरिक विमान ईंधन (एटीएफ) के मुकाबले हरित विमान ईंधन की कीमत काफी अधिक है। यही कारण है कि एयरलाइंस इसे अपनाने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक नहीं दिख रही हैं।

एयर इंडिया में सस्टेनेबिलिटी और सीएसआर (कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व) के प्रमुख निलय रंजन ने कहा कि पेट्रोल की तरह सबके लिए एक जैसा ईंधन उपलब्ध होना चाहिये। इससे किसी भी एयरलाइंस के साथ भेदभाव नहीं होगा। अभी हरित ईंधन का इस्तेमाल करने वाली एयरलाइंस की ईंधन लागत बढ़ जाती है जबकि पूरी तरह पारंपरिक ईंधन का इस्तेमाल करने वाली एयरलाइंस को इसका बोझ नहीं उठाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि एयर इंडिया के 70 प्रतिशत विमान नये हैं और ईंधन के मामले में 15-20 प्रतिशत दक्ष हैं।

घरेलू यात्रियों के मामले में सबसे बड़ी हिस्सेदारी रखने वाली इंडिगो के उपाध्यक्ष (वित्त) कैलाश राणा ने कहा कि हरित विमान ईंधन को अपनाने में उपलब्धता और कीमत दो सबसे बड़ी बाधाएं हैं। यदि ये दोनों बाधाएं दूर कर ली जाती हैं तो हरित विमान ईंधन की खपत एटीएफ से कहीं ज्यादा हो जायेगी। उन्होंने कहा कि बड़ी कंपनियां तो ऊंची कीमत का बोझ बर्दाश्त कर सकती हैं, लेकिन इंडिगो जैसा एमएसएमई (मझौली और छोटी कंपनियां) नहीं।

उल्लेखनीय है कि भारत ने साल 2027 तक विमान ईंधन में एक प्रतिशत हरित ईंधन मिश्रण का लक्ष्य रखा है। इसे बढ़ाकर साल 2028 में दो प्रतिशत और साल 2030 तक पांच प्रतिशत करने का लक्ष्य है।

शिखर बैठक के उद्घाटन सत्र में नागरिक उड्डयन मंत्री के. राम मोहन नायडू ने कहा कि मंत्रालय जल्द ही हरित विमान ईंधन नीति जारी करेगा।

इंडियन ऑयल के कार्यकारी निदेशक एस.के. परांजपे ने कहा कि किसी भी नये ईंधन को अपनाते समय इस पर विचार किया जाना जरूरी है कि उसके लिए फीड स्टॉक (कच्चे माल) की आपूर्ति श्रृंखला कैसी है और वह किस कीमत पर उपलब्ध है। लैंजाजेट और लैंजाटेक के निदेशक (कारोबार विकास) विनीत बक्शी ने कहा कि हरित विमान ईंधन बनाने की लागत का 70 से 75 प्रतिशत फीडस्टॉक पर खर्च होता है। इसकी कीमत एक बड़ी बाधा है।

भारत पेट्रोलियम के निदेशक एवं विमानन कारोबार प्रमुख संजीव कुमार ने कहा कि साल 2030 तक पांच प्रतिशत का लक्ष्य हासिल करने के लिए फीडस्टॉक में विविधता लाने की जरूरत है। उन्होंने अमेरिका की तरह भारत में भी हरित विमान ईंधन के लिए सरकार द्वारा वित्तीय सहायता दिये जाने की वकालत की, जहां प्रति गैलन (लगभग 3.79 लीटर) 1.5 डॉलर की राहत दी जाती है।

एयरबस में हरित विमान ईंधन के प्रमुख जुलियन मनहेस ने नीतिगत स्तर पर स्थिरता सुनिश्चित करने की मांग की। उन्होंने कहा कि हरित ईंधन की उपलब्धता कम है क्योंकि यह नया क्षेत्र है और इसकी पूंजी लागत काफी अधिक है। वहीं एटीएफ लंबे समय से बाजार में है, उसकी पूंजी लागत न के बराबर है। उसके लिए सिर्फ परिचालन लागत की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि पूंजी लागत के लिए वित्त पोषण की उपलब्धता जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि कंपनियों को हरित ईंधन पर सीएसआर राशि खर्च करने की अनुमति दी जानी चाहिये।

भारत में अंतर्राष्ट्रीय हवाई परिवहन संगठन के सस्टेनेबिलिटी के प्रमुख तुहिन सेन ने कहा कि भारत को यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की तरह हरित विमान ईंधन को थोपने से बचना चाहिये। उन्होंने कहा कि यूरोप में इस कारण हरित ईंधन की कीमत काफी बढ़ गयी। भारत जैसे देश में जहां विमान सेवा कंपनियों के कुल व्यय का 40 प्रतिशत तक विमान ईंधन पर खर्च हो जाते है, अच्छा होगा कि वैसी स्थिति देखने को न मिले। भारत में विमानन सिर्फ एक सेवा नहीं है, यह संपर्क का प्रमुख साधन है।

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