नयी दिल्ली , दिसंबर 06 -- हाल ही में प्रकाशित एक शोध के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का पतन अचनाक नहीं, सदियों तक चले लंबे सूखे के कारण हुआ।
जर्नल कम्युनिकेशंस अर्थ एंड एनवायरनमेंट जर्नल में प्रकाशित एक नए शोध पत्र के अनुसार, यह क्षेत्र 4,400 ईसा पूर्व से लेकर 3,400 ईसा पूर्व के बीच गहन सूखे के चार दौर से गुज़रा था। उस दौरान, औसत वार्षिक वर्षा 10 से 20 प्रतिशत तक कम हो गई थी और औसत वार्षिक तापमान लगभग 0.9 डिग्री फ़ारेनहाइट तक बढ़ गया था।
शोधकर्ताओं का मानना है कि ये परिस्थितियाँ अन्य सामाजिक और आर्थिक कारकों के साथ मिलकर इस सभ्यता के पतन में संभावित वजहें थीं।
सिंधु घाटी सभ्यता अपने समय की सबसे विकसित समाजों में से एक थी, जो प्राचीन मिस्र और ईराक की मेसोपोटामिया के समकक्ष थी। आज के भारत-पाकिस्तान सीमा पर सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों के किनारे स्थित इस सभ्यता में उन्नत जल प्रबंधन प्रणालियों वाले बड़े शहर थे। इसकी अपनी एक लिपि थी और कृषि तथा व्यापार पर केंद्रित एक फलती-फूलती अर्थव्यवस्था थी।
इस सभ्यता के पतन की जाँच करने के लिए, शोधकर्ताओं ने 3000 से 1000 ईसा पूर्व तक फैले पुराना जलवायु डेटा एकत्र किया, फिर क्षेत्र की ऐतिहासिक जलवायु का अनुकरण करने के लिए कंप्यूटर मॉडल का उपयोग किया।
शोधकर्ताओं ने पिछली जलवायु परिस्थितियों के अन्य अप्रत्यक्ष संकेतकों को भी देखा, जैसे कि भारतीय गुफाओं में स्टैलेक्टाइट्स और स्टैलेग्माइट्स का भू-रसायन और भारतीय झीलों के जल स्तर के रिकॉर्ड।
विश्लेषण से पता चला कि लगभग 3000 से 2475 ईसा पूर्व तक इस क्षेत्र में बहुत अधिक वर्षा हुई, क्योंकि उस अवधि के दौरान उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर अपेक्षाकृत ठंडा था। लेकिन बाद की सदियों में महासागर गर्म होने लगा, जिससे वर्षा में गिरावट आई और तापमान बढ़ गया।
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